लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें सरकार और जनता के बीच कोई कठोर दीवार नहीं होती। दोनों के बीच संवाद, विश्वास और पारदर्शिता का संबंध होता है, परंतु विडंबना यह है कि बीते कुछ वर्षों में वैश्विक स्तर पर लोकतंत्र का यह स्वरूप लगातार कमजोर होता जा रहा है। यह गिरावट मात्र राजनीतिक संस्थानों तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रेस की स्वतंत्रता, न्यायपालिका की निष्पक्षता, नागरिक अधिकारों और पारदर्शी चुनावों जैसे लोकतंत्र के मूल स्तंभों पर भी भारी दबाव बना हुआ है। हाल ही में स्टॉकहोम स्थित इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसी एंड इलेक्टोरल असिस्टेंस (आईडीए)  की ओर से प्रकाशित द ग्लोबल स्टेट ऑफ डेमोक्रेसी-2025 रिपोर्ट लोकतंत्र की इस गिरावट की गंभीरता को उजागर करती है। 173 देशों के विश्लेषण में यह पाया गया कि 94 देशों में यानी आधे से अधिक, में कम से कम एक लोकतांत्रिक संकेतक में गिरावट दर्ज की गई है। विश्वसनीय चुनावों का ह्रास, न्याय तक सीमित पहुंच और संसद की निष्क्रियता जैसी प्रवृत्तियां गहरी चिंता के विषय हैं। रिपोर्ट बताती है कि अफ्रीका और यूरोप इस गिरावट के सबसे बड़े भागीदार रहे हैं। वहीं प्रेस की स्वतंत्रता जैसे लोकतंत्र के मूल स्तंभ में अभूतपूर्व गिरावट दर्ज की गई। यह पिछले 50 वर्षों की सबसे बड़ी गिरावट है। 43 देशों में पत्रकारिता पर अंकुश बढ़ा है, जिसमें अफगानिस्तान, म्यामां और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के उदाहरण सामने हैं। यहां तक कि अमरीका जैसे देश, जो लंबे समय तक लोकतंत्र का आदर्श माने जाते रहे, अब अपने ही मानकों से पीछे हटते दिखाई दे रहे हैं। हालांकि इस निराशाजनक स्थिति में कुछ देश उम्मीद की किरण भी बने हुए हैं। बोत्सवाना और दक्षिण अफ्रीका जैसे अफ्रीकी देशों ने पारदर्शी चुनावों की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। डेनमार्क, जर्मनी, नॉर्वे और स्विट्जरलैंड जैसे देश अब भी लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा कर रहे हैं। इन उदाहरणों से यह संदेश मिलता है कि यदि इच्छाशक्ति हो, तो लोकतंत्र को मजबूत बनाना अब भी संभव है। लोकतंत्र के कमजोर होने के कई कारण हैं- सत्तालोलुपता, संस्थानों पर नियंत्रण की प्रवृत्ति, मीडिया को दबाने की कोशिश और नागरिकों की उदासीनता। परंतु इससे लड़ने का उपाय भी हमारे पास है- जागरूक, सक्रिय और संगठित नागरिक समाज। जनता की भागीदारी, प्रश्न पूछने की संस्कृृति और संवैधानिक मूल्यों के प्रति निष्ठा लोकतंत्र की रीढ़ हैं। जब तक जनता खुद लोकतंत्र के प्रति सजग और जागरूक नहीं बनेगी, तब तक कोई भी तंत्र इसे बचा नहीं सकता। लोकतंत्र को बचाने के लिए केवल चुनाव में वोट डालना काफी नहीं है, निरंतर निगरानी, विरोध और सुधार की मांग लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखती है।  आज आवश्यकता केवल आलोचना की नहीं, बल्कि सक्रिय जनचेतना और जनांदोलन की है, जो लोकतंत्र को फिर से उसके मूल उद्देश्यों की ओर ले जाए। लोकतंत्र को केवल संस्थाओं से नहीं, बल्कि जन-भागीदारी से जीवन मिलता है। नागरिकों, मीडिया, बुद्धिजीवियों, शिक्षकों, छात्रों और समाज के हर तबके को यह समझना होगा कि लोकतंत्र की रक्षा केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। हमें संविधान, संस्थानों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा में एकजुट होना होगा। लोकतंत्र को सजग नागरिकों की नहीं, संवेदनशील और साहसी नागरिकों की जरूरत है। लोकतंत्र न तो केवल एक प्रणाली है और न ही एक व्यवस्था-यह एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें हर नागरिक की भूमिका अहम है। यदि हम चाहते हैं कि लोकतंत्र जीवित रहे, तो हमें उसकी रक्षा उसी तरह करनी होगी जैसे हम अपनी स्वतंत्रता, अधिकारों और आत्म-सम्मान की करते हैं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि आज लोकतांत्रिक  शक्तियों का ह्रास हो रहा है, जिसके कारण तानाशाही बढ़ रही है। लोकतांत्रिक मूल्यों पर आक्रमण हो रहे हैं। चुनावी गतिविधियां सही ढंग से संचालित नहीं हो रही हैं। अत्यधिक मत प्राप्त करने की जगह मतों का विभाजन करवा कर चुनाव जीते जा रहे हैं। ऐसे में चुनाव जिताने के लिए बड़े-बड़े विशेषज्ञों की मदद ली जा रही है। लोकतंत्र को खोखला करने में इन चुनाव पद्धतियों की अहम भूमिका है।