भारतीय संविधान संसदीय लोकतंत्र पर आधारित एक अनूठा दस्तावेज है, जिसने विविधताओं से भरे इस देश को एक सूत्र में बांधे रखा है। लोकतंत्र की मजबूती का आधार केवल निर्वाचित सरकारें नहीं होतीं, बल्कि वे संवैधानिक संस्थाएं भी होती हैं, जिन्हें निष्पक्षता, मर्यादा और नैतिकता का प्रतीक माना जाता है। राज्यपाल और विधानसभा अध्यक्ष जैसे पद इसी श्रेणी में आते हैं। दुर्भाग्यवश, पिछले एक-डेढ़  दशकों में इन संवैधानिक पदों की भूमिका और निष्ठा को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े हुए हैं। परंपरागत रूप से यह माना जाता रहा है कि राज्यपाल या स्पीकर चाहे किसी भी राजनीतिक पृष्ठभूमि से आए हों, पद ग्रहण करते ही वे दलगत सीमाओं से ऊपर उठकर संविधान के प्रति उत्तरदायी हो जाते हैं। किंतु हाल के वर्षों में उनके आचरण और निर्णयों ने इस विश्वास को कमजोर किया है। ऐसा प्रतीत होता है कि कई अवसरों पर संवैधानिक निष्ठा की जगह वैचारिक या राजनीतिक प्रतिबद्धताएं हावी हो रही हैं, जो भारत जैसे संघीय लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। केंद्र और राज्यों के बीच टकराव कोई नई बात नहीं है। पिछली सदी में भी बहुमत वाली सरकारों को गिराने के आरोप, राज्यपालों की भूमिका पर सवाल और संवैधानिक संकट चर्चा में रहे हैं। लेकिन वर्तमान परिदृश्य में यह टकराव अधिक तीखा और सार्वजनिक होता जा रहा है। विशेष रूप से उन राज्यों में जहां केंद्र और राज्य में अलग-अलग दलों की सरकारें हैं, वहां राजभवन और राज्य सरकारों के बीच तनाव लगातार सुर्खियां बन रहा है। कर्नाटक विधानसभा में हाल ही में घटित घटनाक्रम इसी कड़ी का ताजा उदाहरण है। नए वर्ष के पहले सत्र में राज्यपाल का अभिभाषण एक संवैधानिक परंपरा है, जिसमें सरकार की नीतियों और प्राथमिकताओं को प्रस्तुत किया जाता है। यह राज्यपाल का निजी वक्तव्य नहीं, बल्कि मंत्रिपरिषद की ओर से तैयार आधिकारिक दस्तावेज होता है। बावजूद इसके कर्नाटक में राज्यपाल की ओर से परंपरागत अभिभाषण को सीमित कर सदन से बाहर चले जाना न केवल असामान्य था, बल्कि इसने एक नए संवैधानिक विवाद को जन्म दे दिया। राज्य सरकार ने इसे केंद्र सरकार के इशारे पर किया गया कदम बताया। विडंबना यह है कि ऐसे ही दृश्य हाल के दिनों में तमिलनाडु और केरल की विधानसभाओं में भी देखने को मिले हैं। यह संकेत करता है कि यह समस्या किसी एक राज्य तक सीमित नहीं, बल्कि एक व्यापक प्रवृत्ति बनती जा रही है। विपक्षी दलों की ओर से शासित राज्यों का आरोप है कि राज्यपालों का उपयोग केंद्र सरकार के राजनीतिक उद्देश्यों को साधने के लिए किया जा रहा है, जिससे संघीय ढांचे की आत्मा को आघात पहुंचता है। निस्संदेह, राज्यपाल को मंत्रिपरिषद की ओर से भेजे गए मसविदे पर आपत्ति जताने का अधिकार है। लेकिन इस अधिकार के साथ संवैधानिक नैतिकता और संवाद की भावना भी उतनी ही आवश्यक है। असहमति का समाधान टकराव नहीं, बल्कि बातचीत से निकलना चाहिए। सदन के भीतर आमने-सामने की भिड़ंत न केवल संस्थागत गरिमा को ठेस पहुंचाती है, बल्कि जनता के विश्वास को भी कमजोर करती है। आज जब केंद्र सरकार राजभवनों को ‘लोकभवन’ कहने की पहल कर रही है, तो यह विचार प्रतीकात्मक रूप से आकर्षक अवश्य है। लोकतंत्र में लोक सर्वोपरि है और औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकलना आवश्यक भी। लेकिन नाम बदलने से अधिक जरूरी है व्यवहार बदलना। लोकभवन तभी सार्थक होगा, जब वहां से लिये गए निर्णय वास्तव में जनता के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दें, न कि राजनीतिक टकराव को। अंतत: राज्यपाल और राज्य सरकारों का साझा उद्देश्य जनादेश का सम्मान और जनहित की रक्षा होना चाहिए। यदि सत्ता के दोनों केंद्र विपरीत दिशाओं में काम करने लगें, तो शासन की गुणवत्ता प्रभावित होना स्वाभाविक है। यह केवल अहं का संघर्ष नहीं, बल्कि भारतीय संघवाद की एक गंभीर परीक्षा है। इस परीक्षा में सफल होने के लिए संवैधानिक मर्यादा, संवाद और निष्पक्षता ही एकमात्र मार्ग है।