कोलकाता : सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि उग्रवादी म्यामां के साथ लगते चीन के सीमावर्ती इलाकों में फिर से संगठित होने की दिशा में काम कर रहे हैं, ऐसे में हालिया महीनों में देश के पूर्वोत्तर राज्यों में उग्रवादी हमलों के बीच मणिपुर में चुनाव और नगालैंड में शांति वार्ता के बीच इनके हमलों के बढ़ने की आशंका है। ऐसा माना जा रहा है कि रुकी हुई वार्ता के कारण अधीर नगा समूह और आगामी मणिपुर विधानसभा चुनावों बाधित करने के इच्छुक विद्रोही मणिपुरी समूह चीन के यून्नान प्रांत और म्यामां में सीमावर्ती इलाकों में फिर से संगठित हो रहे हैं। इसके लिए वे म्यामां में उथल-पुथल का फायदा उठाकर उसे आवागमन के गलियारे के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। असम राइफल्स के पूर्व महानिरीक्षक मेजर जनरल भबानी एस दास ने भाषा से कहा कि उग्रवाद के फिर से सिर उठाने का चीनी पहलू है। कई समूहों के चीन में लोग हैं। ऐसा माना जा रहा है कि ‘यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम’ (आई), ‘पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ऑफ मणिपुर’ और शांति वार्ता के विरोधी नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड (एनएससीएन) (के) के अलग हुए गुट सीमावर्ती इलाकों में फिर से संगठित हो रहे हैं। सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के सेवानिवृत्त अतिरिक्त महानिदेशक एवं पूर्वोत्तर उग्रवाद संबंधी मामलों के विशेषज्ञ संजीव कृष्ण सूद ने कहा कि चीन संबंधी कारक को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता,लेकिन हमें इस तथ्य को भी देखना होगा कि कई नगा शांति वार्ता में अलसुलझे मामलों के कारण अधीर हो गए हैं और मणिपुरी उग्रवादी आगामी विधानसभा चुनाव में हस्तक्षेप करना चाहेंगे। मणिपुर में हाल में हुए उग्रवादी हमले उन विस्फोटों का हिस्सा माने जा रहे है, जिन्हें लोकतांत्रिक प्रक्रिया के दौरान करने की योजना बनाई जा रही है। अक्सर अलग-अलग लक्ष्य रखने वाले उग्रवादी समूहों ने बड़े हमले करने के लिए हाथ मिलाया है। इन हमलों में पिछले साल 13 नवंबर को मणिपुर के चुराचांदपुर जिले में आईईडी विस्फोटकों और गोलियों से घात लगाकर किया गया वह हमला भी शामिल है, जिसमें असम राइफल्स के एक कमांडिंग अफसर, उनकी पत्नी और बेटे तथा बल के चार अन्य कर्मियों समेत सात लोगों की मौत हो गई थी। दो प्रतिबंधित उग्रवादी संगठनों पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) और मणिपुर नगा पीपुल्स फ्रंट (एमएनपीएफ) ने चुराचांदपुर जिले के सेहकन गांव में अर्द्धसैन्य बल पर हमले की जिम्मेदारी ली है। आईपीएस (सेवानिवृत्त) और मॉरीशस के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे सुरक्षा विश्लेषक शांतनु मुखर्जी ने कहा कि आमतौर पर मैतेई समूहों और नगा समूहों के अलग-अलग और कभी-कभी शत्रुतापूर्ण उद्देश्य होते हैं तथा वे एक साथ नहीं आते (हालांकि पीएलए ने 1980 के दशक में उत्तरी म्यामां में एनएससीएन से अपना प्रारंभिक प्रशिक्षण प्राप्त किया था)... इनके बीच एक मात्र संबंध यह है कि वे चीन के कुनमिंग में शरण लेते हैं और वहीं हथियार खरीदते हैं। 1950 के दशक में शुरू हुए नगा विद्रोह को प्रशिक्षण और हथियारों में रूप में चीनी सहयोग मिला। इसके अलावा कुछ विद्रोही समूह ईस्ट पाकिस्तान और बाद में बांग्लादेश गए,जहां पाकिस्तान के आईएसआई से उन्हें समर्थन मिला। पूर्वोत्तर विद्रोही समूहों को कतई बर्दाश्त नहीं करने की नीति अपनाने वाली शेख हसीना सरकार ने बांग्लादेशी मार्ग बंद कर दिया, ऐसे में इन समूहों के पास म्यामां के जरिए चीन सबसे अच्छा विकल्प शेष है।