पूर्वांचल प्रहरी के पुरोधा, विलक्षण दूरदर्शिता तथा असाधारण सामाजिक प्रतिबद्धताओं से संपन्न श्रद्धेय जी.एल. अग्रवाला का आज के दिन हम सभी सादर-सप्रेम विशेष स्मरण करते हैं। माता-पिता के इकलौते पुत्र, बहनों के दुलारे भाई, एक द्रवणशील प्रकाशपुंज सदृश पिता, पुत्रवधू के अथक प्रशंसक, पौत्र-पौत्री के लिए कल्पवृक्ष तथा परिजनों के लिए धरित्री सम आधार - एक सफल गृहस्थ होने के साथ-साथ असम के संकटापन्न प्रवासी समाज के लिए वे सदैव ‘गोवर्द्धनधारी’ की भूमिका में रहे, वहीं दूसरी ओर असमिया समाज-साहित्य व संस्कृति में आकंठ रचे-बसे रहे। उनके अकुतोभय बहुआयामी व्यक्तित्व को कवि अज्ञेय के शब्दों में कुछ इस तरह रूपायित किया जा सकता है-

      ‘‘मैं आस्था हूँ तो मैं

      निरंतर उठते रहने की शक्ति हूँ...

      मैं गाथा हूँ तो मैं

      मानव का अलिखित इतिहास हूँ

      मैं संघर्ष हूँ जिसे विश्राम नहीं,

      जो है मैं उसे बदलता हूँ,

      जो मेरा कर्म है,

      उसमें मुझे संशय का नाम नहीं...

      मैं अभय हूँ,

      मैं भक्ति हूंँ,

      मैं जय हूँ।’’

असम के जातीय-तांडव के विकराल दौर में निर्भय हुंकार भरते हुए पूर्वांचल प्रहरी का प्रादुर्भाव हुआ। समाज को सुुरक्षा और सम्यक् मार्गदर्शन देने की  पूत भावना से अभिप्रेरित, निन्दा-स्तुति में ऋषितुल्य स्थितप्रज्ञता के साथ श्रद्धेय अग्रवाला पत्रकारिता के कंटकाकीर्ण पथ पर आजीवन अग्रसर रहे-न कहीं ठहराव, न कभी संशय, रहा तो मात्र सच्ची पत्रकारिता का भीष्म-संकल्प। श्री जी.एल. अग्रवाला की जीवन-यात्रा विजय का उद्घोष है जो पूर्वोत्तर भारत के इतिहास में सदैव गुंजायमान रहेगा- 

‘‘पढ़ो उसे जो झलक रहा है मुझमें तेज-प्रकाश।

 मेरे रोम-रोम में अंकित है मेरा इतिहास।’’

                                                       - दिनकर