डॉ. हिमंत विश्वशर्मा-
पिछले चुनाव के दौरान अनेक महिलाओं ने मुझे अवगत कराया कि वे माइक्रोफाइनेंस से लिए कर्ज को चुका नहीं पा रही हैं। उस समय चुनाव प्रचार चल रहा था और मैंने उन्हें आश्वासन दिया कि माइक्रोफाइनेंस का ऋण चुकाने में असमर्थ महिलाओं का ऋण माफ किया जाएगा। बाद में माइक्रोफाइनेंस कंपनियों ने मुझे सूचित किया कि उन्होंने 24 लाख महिलाओं को करीब 12 हजार करोड़ रुपए का ऋण दिया है। 31 मार्च, 2021 के तक 14 लाख महिलाएं ऋण चुका नहीं पा रही थीं, उनमें से प्रत्येक का बकाया ऋण 40-50 हजार रुपए तक था और कुल 7 हजार करोड़ रुपए का ऋण बकाया था। हमने फैसला किया कि जिन महिलाओं के परिवार में किसी को सरकारी नौकरी नहीं है या जो गरीब परिवारों से हैं उनका ऋण माफ कर दिया जाएगा, परंतु इस दौरान हमने यह भी सोचा कि जो महिलाएं नियमित रूप से ऋण का किस्त चुका रही हैं,उन्हें भी आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करने हेतु कुछ उपाय करने होंगे। 31 मार्च, 2021 तक नियमित रूप से ऋण के किस्तों को चुकाने वालीं महिलाओं की संख्या करीब 11 लाख थी। उन लोगों ने जो ऋण लिया था उनमें से 20-30 हजार रुपए चुकाना बाकी था। सरकार ने इस संदर्भ में फैसला लिया कि नियमित रूप से ऋण चुकाने वाली महिलाओं का बकाया ऋण,जो 25 हजार रुपए कम होगा सरकार उन्हें प्रेरणामूलक सहायता के रूप में प्रदान करेगी। इस हिसाब से इन महिलाओं को सर्वाधिक 25 हजार रुपए से 500 रुपए तक प्रेरणामूलक आर्थिक सहायता मिल चुकी है। इस संदर्भ में एक बात का उल्लेख करना प्रासंगिक होगा। आर्थिक सहायता वितरित करते समय सरकार कुछ महिलाओं के लिए कार्यक्रम का आयोजन करके औपचारिक रूप से चेक प्रदान किया। बाकी महिलाओं को प्रखंड विकास अधिकारी के कार्यालय से चेक लेना है, परंतु इस प्रकार चेक लेते समय किसी सरकारी कर्मचारी को कुछ भी नहीं देना चाहिए। हम असम में एक ऐसी संस्कृृति बनाने की कोशिश कर रहे हैं जिसमें सरकारी कार्यालयों में कोई कर्मचारी जनता की सेवा करते समय किसी प्रकार का रिश्वत न ले। लोगों को अब से जाति प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र, भविष्यनिधि के काम तथा अन्य किसी भी काम के लिए सरकारी कार्यालयों में कर्मचारियों को रिश्वत देने की जरूरत नहीं है। अब लोग व्यवसायिक लाइसेंस के लिए ऑनलाइन आवेदन कर सकेंगे। नियुक्ति के लिए पंजीकरण करने के लिए ऑनलाइन आवेदन कर सकेंगे। लर्नर ड्राइविंग लाइसेंस के लिए ऑनलाइन आवेदन करके लाइसेंस भी ऑनलाइन प्राप्त कर सकेंगे। जाति प्रमाण पत्र के लिए सरकारी अधिकारी स्कूलों की नौवीं कक्षाओं में जाकर वहीं प्रमाण पत्र प्रदान करेंगे। इसके लिए किसी को आवेदन करने की या उपायुक्त कार्यालय जाने की जरूरत नहीं होगी। इस प्रकार हम सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग करके जनता के लिए घर में बैठकर ही अनेक काम करने की कोशिश कर रहे हैं। असम में विभिन्न प्रकार के अनेक सार्वजनिक संगठन हैं। विभिन्न छात्र संगठन, विभिन्न जाति-जनगोष्ठियों के संगठन, किसानों के संगठन, विभिन्न रोजगार से संबंधित कर्मचारियों के संगठन, शारदीय दुर्गापूजा सहित विभिन्न धार्मिक त्यौहारों तथा असम के जातीय उत्सव बिहू मनाने के लिए भी हरेक जिले में अनेक दशकों पुराने स्थायी संगठन हैं। ये संगठन विभिन्न आयोजनों के लिए चंदा वसूलते हैं। इसके अलावा असम में निरंतर चल रहे कई आंदोलनों के लिए चंदे इकट्ठे किए जाते थे और अब भी ऐसा हो रहा है। चंदे के लिए जबर्दस्ती करना, भय दिखाकर चंदा इकट्ठा करना आदि के साथ-साथ चंदे की राशि में से कुछ अपने लिए भी उपयोग करना आदि घटनाएं भी परिलक्षित होती हैं। इसके जरिए समाज लाभान्वित होता है या नहीं यह भी विचारणीय है। उल्लेखनीय यह है कि चंदे के लिए अधिकांश स्थलों पर व्यवसायिक तथा औद्योगिक क्षेत्र पर अधिक निर्भर किया जाता है। पिछले दिनों कोविड की स्थिति में अनेक व्यवसायिक तथा औद्योगिक प्रतिष्ठान बंद हो चुके हैं। इन प्रतिष्ठानों के अनेक कर्मचारियों को रोजगार खोना पड़ा है। इस दरम्यान भारी नुकसानों का सामना करते हुए भी कुछ व्यवसायिक तथा औद्योगिक प्रतिष्ठान किसी तरह चल रहे हैं। बिहू तथा पूजा आदि के लिए अगर इनसे चंदे वसूलने की कोशिश की जाती है तो उनके लिए यह कोशिश हानिकारक साबित होगी। आप सोचिए, एक युवक एक व्यवसायिक प्रतिष्ठान स्थापित करके खुद आत्मनिर्भर बना है और तीन अन्य युवकों को भी रोजगार देने में कामयाब हुआ है। अब अगर चंदे के बोझ के कारण उसे अपना प्रतिष्ठान बंद करना पड़े तो उसका अपना रोजगार तो बंद हो ही जाएगा अन्य तीन युवकों का रोजगार भी नहीं रहेगा। हम नहीं चाहते कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो। अगर कोई फैंसी बाजार के व्यवसायियों से चंदा वसूलने जाता है तो दुकानदार चंदा अपने मूलधन से नहीं देगा, बल्कि वह चावल, आलू, प्याज का दाम बढ़ा देगा। इस प्रकार चंदे के कारण आम जनता को परेशानी का सामना करना पड़ेगा। इस बार हम कलाकारों की आर्थिक स्थिति को देखते हुए रंगाली बिहू कार्यक्रम आयोजित करने में कोई पाबंदी नहीं लगा रहे हैं। सिर्फ कानूनी और नियम-शृंखला के मुद्दों को ध्यान में रखकर एक निर्धारित समय तक कार्यक्रम चलाने की व्यवस्था की जाएगी। इसके अलावा पिछले दस सालों से बिहू कार्यक्रम चलाते रहे संगठनों को बैशाख महीने के पहले सात दिनों तक कार्यक्रम आयोजित करने के लिए सहायता राशि के रूप में हमने 1.5 लाख रुपए देने की घोषणा की है। इस प्रकार हम चंदे को रोककर व्यवसायी लोगों पर दबाव को कम करने के साथ-साथ असम की संस्कृृति को भी बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं। इस व्यवस्था के जरिए राज्य के कलाकार भी लाभान्वित होंगे। आर्थिक क्षेत्र में हमारे राज्य की स्थिति ऐसी है कि केंद्रीय सरकार अगर आबंटन नहीं देती है तो हम कुछ नहीं कर सकते, परंतु हमारे पास सबकुछ तो है। हमारे पास प्रचूर मात्रा में प्राकृृतिक संसाधन, पर्यटन उद्योग के लिए काफी आकर्षण, कृृषि के लिए सुविधाजनक परिवेश तथा विभिन्न उद्योगों के लिए अनेक सुविधाएं उपलब्ध हैं। हमारे यहां के खेत काफी समय तक खाली पड़े रहते हैं। परंतु पंजाब और हरियाणा आदि राज्यों में किसान खेतों में कुछ न कुछ फसल लगाते ही रहते हैं, उसे खाली पड़े रहने नहीं देते। पहले कहा जाता था कि खेती से उत्पन्न फसलों के लिए सही दाम नहीं मिलते। इस बार हमने एफसीआई से बात की है। एफसीआई को असम के किसानों से भी 1940 रुपए प्रति क्विंटल की दर पर धान खरीदना होगा। इस प्रकार अब किसानों को धान की खेती से भी लाभ मिलेगा। इसके अलावा यहां के युवा वर्ग बॉॅयलर मुर्गी और अंडे आदि उत्पन्न करके भी लाभान्वित हो सकते हैं। हाल ही में जोरहाट के आकाशज्योति गोगोई नामक एक युवक को असम गौरव से सम्मानित किया गया है। उन्होंने बाहुबली नामक एक किस्म का अंडा दैनिक 50 हजार उत्पादन करके यहां के युवा के सामने एक नजीर पेश की है, उनकी तरह असम गौरव सम्मान से सम्मानित तिनसुकिया की बॉबी हजारिका नामक एक महिला ने पीठा और लड्डू आदि का व्यवसाय करके आत्मनिर्भर बनने का विशिष्ट तरीका अपनाकर युवा वर्ग के सामने उदाहरण प्रस्तुत किया है। असम का युवा वर्ग, महिला वर्ग अगर आत्मनिर्भर बनने का संकल्प लेकर काम करने लगे तो असम भारतवर्ष में सबसे अमीर राज्य हो सकता है। स्वतंत्रता के 75 वर्ष बीतने के बाद भी हमें दूसरे राज्यों के सामने हाथ फैलाने की जरूरत क्यों पड़ती है? कर्म संस्कृति से विमुख होकर कब तक हम सिर्फ जय आइ असम कहकर शान से जी सकेंगे? हमें अब सोचने की जरूरत है कि जिस जाति ने शंकर-माधव-अनिरुद्धदेव को जन्म दिया, वही जाति अब दूसरों की कृृपा पर क्यों जीए ? डॉ. भूपेन हजारिका ने कहा था कि विश्व रुपी शरीर में हम अगर विकलांग रूप में रहे तो क्या विश्व को यह अच्छा लगेगा? हम क्यों एक कर्म-संस्कृृति का परिवेश नहीं बनाते? अगर कर सकते हैं तो आगामी दो सालों में असम का राज्य स्तरीय उत्पादन सालाना पांच लाख करोड़ रुपए तक बढ़ा सकते है और 2026 तक यह आठ लाख करोड़ रुपए का हो सकता है। हम अगर असम में एक कर्म संस्कृृति का आंदोलन चलाएं तो असम अवश्य विकास के शिखर तक पहुंच जाएगा।
अनुवाद : डॉ. गोलोक चन्द्र डेका (पूर्वांचल प्रहरी डेस्क संवाददाता)