नई दिल्ली : केंद्र सरकार ने उत्तर पूर्वी राज्यों असम, नगालैंड व मणिपुर से सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून (अफस्पा) का क्षेत्र सीमित करने का फैसला किया है। दायरा सीमित किए जाने के बाद यह कानून अब इन राज्यों के कुछ खास इलाकों में ही लागू रहेगा। उत्तर-पूर्व के राज्यों से इस कानून को हटाने के लिए लंबे समय से मांग हो रही है। बीते सालों में इस कानून का दायरा लगातार कम हो रहा है। अफस्पा कानून क्या है? ये कितने राज्यों में अभी भी लागू है?अफस्पा के जरिए सैन्य बलों को क्या विशेषाधिकार दिए गए? इस कानून का दायरा कम करने का क्या असर होगा? कानून का विरोध क्यों होता है? दशकों से लागू कानून को अभी ही क्यों हटाया जा रहा है? अफस्पा यानी सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून। इसका मूल स्वरूप अगस्त 1942 में अंग्रेजों ने लागू किया था। उस वक्त भारत छोड़ो आंदोलन चल रहा था। आंदोलन को कुचलने के लिए इस कानून में सैन्य बलों को विशेष अधिकार दिए गए थे। आजाद भारत की बात करें तो मई 1958 में नगालैंड में जारी विद्रोह को दबाने के लिए एक अध्यादेश के जरिए अफस्पा लाया गया। 11 सितंबर 1958 को संसद से पास होने के बाद अफस्पा कानून लागू हुआ। जनवरी 1967 में पूरे मिजोरम को भी अफस्पा के दायरे में लाया गया। नवंबर 1970 में अफस्पा के दायरे को और बढ़ा दिया गया। अब पूरे त्रिपुरा में भी इसे लागू कर दिया गया। सितंबर 1980 में इस कानून को मणिपुर में भी लागू कर दिया गया। फरवरी 1987 में इसका दायरा बढ़ाकर अरुणाचल प्रदेश को भी अफस्पा के दायरे में लाया गया। नवंबर 1990 में असम में भी जारी उल्फा विद्रोह के चलते यहां भी अफस्पा लागू हुआ। इसके साथ ही मेघालय में भी इसे लागू कर दिया गया। इस कानून के दुरुपयोग के खिलाफ विरोध शुरू हो गया था। नवंबर 2000 में मणिपुर की एक्टिविस्ट इरोम शर्मिला भूख हड़ताल पर बैठ गईं। शर्मिला इस कानून को हटाने की मांग कर रहीं थीं। जुलाई 2004 में इस कानून के खिलाफ पूरे मणिपुर में विरोध प्रदर्शन हुए। जून 2005 में बीपी जीवन रेड्डी कमेटी ने इस कानून को हटाए जाने की सिफारिश की। मई 2015 में त्रिपुरा पहला राज्य बना जहां से अफस्पा को हटाया गया। अप्रैल 2018 में मेघालय से अफस्पा को हटाया गया। मार्च 2022 में केंद्र ने असम, मणिपुर और नगालैंड के अधिकांश इलाकों से अफस्पा को हटाया। असम के 33 कुल जिलों में से 23 जिलों से अफस्पा को हटा लिया गया है। नौ जिलों में ये अभी भी लागू है। वहीं, कछार जिले में इस कानून को आंशिक रूप से लागू रखा गया है। नगालैंड के 11 जिलों में से तीन जिलों से पूरी तरह और कोहिमा समेत चार जिलों से आंशिक रूप से इस कानून को हटा लिया गया है। इसी तरह मणिपुर के कुल 16 जिलों में से छह जिले ऐसे हैं जहां से अफस्पा को पूरी तरह हटा लिया गया है। बाकी जिलों में अभी भी ये कानून लागू रहेगा। ये कानून सशस्त्र बलों को अशांत क्षेत्रों में शांति बनाए रखने के लिए विशेष अधिकार देता है। इसका उल्लंघन करने वाले पर बल प्रयोग और उस पर गोली चलाने तक की भी अनुमति होती है। इसमें सैन्य बलों को बिना वारंट के किसी को भी संदेह के आधार पर गिरफ्तार करने, किसी परिसर में प्रवेश करने और उसकी तलाशी लेने का भी अधिकार है। यहां तक कि केंद्र सरकार की मंजूरी के बिना सुरक्षा बलों के खिलाफ कोई मुकदमा या कानूनी कार्रवाई भी नहीं हो सकती है। उत्तर-पूर्व के लोग बीते करीब 60 साल से इस कानून के साये में जी रहे हैं। इसकी वजह से यहां के लोग देश के बारी राज्यों से अलग-थलग महसूस करते हैं।
पूर्वोत्तर के कई इलाकों से क्यों हटा अफस्पा?