हमने कभी वेदों का अध्ययन नहीं किया, हमने कभी गीता पढक़र उसे अमल में लाने का प्रयास नहीं किया। हमने योग विद्या को कभी नहीं अपनाया। हमने आयुर्वेद में कोई अनुसंधान नहीं किया। हमने संस्कृत भाषा को कोई महत्व नहीं दिया। ऐसी बहुत सी अच्छी और महत्वपूर्ण चीजें है जो हमारे पूर्वज हमें विरासत में दे गए हैं लेकिन हम पाश्चात्य संस्कृति अपनाने में अंधे हो गए। हमने धीरे धीरे हमारी संस्कृति को ही छोडऩे का काम किया। अब एक बहुत छोटी सी बात है पर हमने उसे विस्मृत कर दिया। इस भोजन संस्कृृति में बैठकर खाना और उस भोजन को दोने पत्तल पर परोसने का बड़ा महत्व था। कोई भी मांगलिक कार्य हो उस समय भोजन एक पंक्ति में बैठकर खाया जाता था और वो भोजन पत्तल पर परोसा जाता था। जोकि विभिन्न प्रकार की वनस्पति के पत्तों से निर्मित होती थी। क्या हमने कभी जानने की कोशिश की कि ये भोजन पत्तल पर परोसकर ही क्यों खाया जाता था? नहीं क्योंकि हम उस महत्व को जानते तो देश में कभी ये ‘बुफे’ जैसी खड़े होकर भोजन करने की संस्कृति आती ही नहीं। जैसा कि हम जानते हैं कि पत्तलें अनेक प्रकार के पेड़ों के पत्तों से बनाई जा सकती हैं इसलिए अलग-अलग पत्तों से बनी पत्तलों में गुण भी अलग-अलग होते हैं। तो आइए जानते हैं कि कौन से पत्तों से बनी पत्तल में भोजन करने से क्या फायदा होता है? लकवा से पीडि़त व्यक्ति को अमलतास के पत्तों से बनी पत्तल पर भोजन करना फायदेमंद होता है। जिन लोगों को जोड़ों के दर्द की समस्या है ,उन्हें करंज के पत्तों से बनी पत्तल पर भोजन करना चाहिए। जिनकी मानसिक स्थिति सही नहीं है उन्हें पीपल के पत्तों से बनी पत्तल पर भोजन करना चाहिए। पलाश के पत्तों से बनी पत्तल में भोजन करने से खून साफ होता है और बवासीर के रोग में भी फायदा मिलता है। केले के पत्ते पर भोजन करना तो सबसे शुभ माना जाता है। इसमें बहुत से ऐसे तत्व होते हैं जो हमें अनेक बीमारियों से भी सुरक्षित रखते हैं। पत्तले प्राकतिक रूप से स्वच्छ होती है इसलिए इस पर भोजन करने से हमारे शरीर को किसी भी प्रकार की हानि नहीं होती है। अगर हम पत्तलों का अधिक से अधिक उपयोग करेंगे तो गांव के लोगों को रोजगार भी अधिक मिलेगा क्योंकि पेड़ सबसे ज्यादा ग्रामीण क्षेत्रो में ही पाए जाते हैं। अगर पत्तलों की मांग बढ़ेगी तो लोग पेड़ भी ज्यादा लगाएंगे। जिससे प्रदूषण कम होगा। डिस्पोजल के कारण जो हमारी मिट्टी, नदियों ,तालाबों में प्रदूषण फैल रहा है, पत्तल के अधिक उपयोग से वह कम हो जाएगा।
तिनसुकिया, असम