नई दिल्ली : दिसंबर 2014 के बाद से रुपए में डॉलर की तुलना में 25 प्रतिशत तक की कमजोरी आ चुकी है। मंगलवार को रुपया ग्लोबल बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण प्रति डॉलर 80 रुपए के मनोवैज्ञानिक स्तर को भी पार कर गया है। ऐसे में इस बात का आकलन जरूरी है कि रुपए की इस गिरावट का आम आदमी के जीवन पर क्या असर पडऩे वाला है? कुल मिलाकर देखा जाए तो रुपए में जैसे-जैसे कमजोरी बढ़ेगी आम आदमी की मुसीबत भी बढ़ती ही जाएगी। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि हमारा देश बहुत सारी चीजों के लिए आयात पर निर्भर है। ज्यादातर आयात-निर्यात अमेरिकी डॉलर में ही होता है इसलिए बाहरी देशों से कुछ भी खरीदने के लिए हमें अधिक मात्रा में रुपए खर्च करने पड़ेंगे। ऐसे में पेट्रोल-डीजल समेत अन्य आयातित वस्तुएं देश मे महंगी होती जाएंगी। रुपए में कमजोरी का असर कंप्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल फोन, खाद्य तेल और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक सामानों पर पड़ सकता है। ज्यादातर इलेक्ट्रॉनिक सामान और गैजेट्स विदेश से आयात किए जाते हैं। ऐसे में, रुपए के कमजोर होने से उनकी कीमतें भी बढ़ सकती है, क्योंकि समान मूल्य और मात्रा के लिए आयातकों को अधिक पैसा चुकाना पड़ेगा। विदेश में पढ़ाई करना भी रुपए में कमजोरी के कारण महंगा हो सकता है। रुपए के मूल्य में गिरावट का साफ मतलब यह है कि आपको हर डॉलर के लिए ज्यादा रुपए चुकाने पड़ेंगे। इससे विदेश में पढऩे वाले छात्रों का खर्च निश्चित तौर पर बढ़ जाएगा। अगर आप कारोबार या छुट्टियां मनाने के लिए विदेश जाने की सोच रहे हैं तो रुपए के कमजोर होने से ये आपके के लिए खर्चीला सौदा साबित हो सकता है। जैसे-जैसे रुपया कमजोर होकर नीचे गिरेगा आपकी विदेश यात्रा महंगी होती जाएगी। अगर आपने 70 रुपए प्रति डॉलर के स्तर पर अपनी विदेश यात्रा का प्लान बनाया था तो रुपए के 80 रुपए प्रति डॉलर पर चले जाने से आपके खर्च में भी तकरीबन 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो जाएगी। रुपए की कीमत जैसे-जैसे नीचे जाती है इससे देश का आयात भी महंगा होता जाता है, इससे देश का विदेश व्यापार घाटा भी बढ़ता है। रुपए में आ रही कमजोरी सबके लिए नुकसान का सौदा नहीं है। निर्यातकों को इससे फायदा होने वाला है। इसका कारण यह है कि विदेश में सामान बेचने से डॉलर में आमदनी होती है और जैसे-जैसे रुपया कमजोर होकर गिरेगा उन्हें अपने उत्पाद की ज्यादा कीमत मिलेगी। आईटी और फार्मा कंपनियों को रुपए में कमजोरी से फायदा मिलेगा क्योंकि वे अपने उत्पादों का बड़े पैमाने पर निर्यात भी करते हैं। उनकी ज्यादातर आय डॉलर में ही होती है। वैश्विक मुद्रा बाजार में अधिकांश मुद्राओं की तुलना डॉलर के साथ ही की जाती है। हम अक्सर देखते हैं कि किसी देश की मुद्रा की डॉलर के मुकाबले उसकी कीमत चर्चा में रहती है। हमारे देश में भी रुपए के उतार चढ़ाव की तुलना डॉलर से ही की जाती है।
रुपया 80 पार, आम आदमी पर इस कमजोरी से कितनी पड़ेगी मार?