शीतला सप्तमी या अष्टमी व्रत सुबह नहाकर कर शीतला माता की पूजा की जाती है। इस व्रत के एक दिन पहले मीठा भात, चूरमा, बेसन चक्की, पुए, पकौड़ी, रबड़ी, बाजरे की रोटी, पूड़ी सब्जी आदि बनाया जाता हैं। रात को सारा भोजन बनाने के बाद रसोईघर को साफ सफाई करके अगले दिन सुबह शीतला माता की पूजा की जाती है। फिर शीतला सप्तमी या अष्टमी पर बासी और ठंडे व्यंजनों का भोग लगाया जाता है। उसके बाद घर के सभी लोग सिर्फ ठंडा खाना ही खाते हैं।
इस पूजा के बाद चूल्हा नही जलाया जाताः शीतला सप्तमी या अष्टमी का व्रत करने से शीतला माता धन-धान्य से पूर्ण कर प्राकृृतिक विपदाओं से दूर रखती हैं। इसके साथ ही पूजा करने से चेचक , खसरा आदि रोगों का प्रकोप नही फैलता है।
शीतला सप्तमी या अष्टमी व्रत कब है? शीतला सप्तमी या अष्टमी का व्रत चैत्र महीने के कृृष्ण पक्ष की सप्तमी और अष्टमी तिथि को किया जाता है। इस साल यह व्रत 3 और 4 अप्रैल को है। भारत के ज्यादातर हिस्सों में सप्तमी तिथि पर ये व्रत किया जाता है, वंही कुछ लोग इसे शीतला अष्टमी के रूप में मनाते हैं। इन दिनों में शीतला माता की पूजा और व्रत दोनों किए जाएंगे। वही शीतला माता को पूजा के बाद ठंडा पानी, बासी प्रसाद का भोग लगाया जाएगा।
शीतला माता को क्यों चढ़ाया जाता है बासी प्रसाद? शीतला सप्तमी या अष्टमी पर घर में ताजा भोजन नहीं बनाया जाता। इस दिन ठंडा भोजन खाए जाने का रिवाज है , इसका धार्मिक कारण यह है कि शीतला माता जिन्हें ठंडा अतिप्रिय हैं। इसलिए शीतला देवी को प्रसन्न करने के लिये उन्हें ठंडी चीजों का भोग लगाया जाता है। इस कारण से ही उत्तर भारत में शीतला सप्तमी या अष्टमी का ये व्रत बसौड़ा के नाम से भी जाना जाता है। इसके पीछे एक कारण ये भी है कि इस दिन के बाद से बासी भोजन करना बंद कर दिया जाता है। ये ऋतु का अंतिम दिन होता है, जब बासी खाना खा सकते हैं।
संदीप अग्रवाल
डिब्रूगड़
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