राष्ट्रीय राजधानी में ‘वृक्ष प्रत्यारोपण नीति’ लागू होने के बावजूद वर्ष 2021-22 में प्रत्यारोपण किए गए पेड़ों में से केवल 37 प्रतिशत ही बच पाए हैं। वन विभाग के आंकड़ों से यह जानकारी सामने आई है।  वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, नीति लागू होने से वृक्ष प्रत्यारोपण प्रक्रिया और वैज्ञानिक हो गई, लेकिन हम अभी तक इसके प्रभाव का अध्ययन नहीं कर पाए हैं क्योंकि इसे अमल में आए डेढ़ साल ही हुए हैं। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, पिछले तीन साल में दिल्ली में प्रत्यारोपित किए गए 16,461 वृक्षों में से केवल एक तिहाई (33.33 प्रतिशत) ही बचे हैं।  वहीं, 2019-20 के दौरान प्रत्यारोपित किए गए 4,162 वृक्षों में से केवल 1,521 पेड़ बचे हैं।  आंकड़ों के अनुसार, 2020-21 में 7,003 वृक्षों में से सिर्फ 2,001 (28।57 प्रतिशत) और 2021-22 में प्रत्यारोपित किए गए 5,296 पेड़ों में से 1,965 (37.10 प्रतिशत) बचे हैं।  दिसंबर 2020 में अधिसूचित दिल्ली सरकार की ‘वृक्ष प्रत्यारोपण नीति’ के अनुसार, संबंधित एजेंसियों को अपने विकास कार्यों के कारण प्रभावित वृक्षों का कम से कम 80 प्रतिशत प्रत्यारोपण करना होगा। वृक्ष प्रत्यारोपण करने के एक वर्ष के भीतर पेड़ के बचे रहने की मानक दर 80 प्रतिशत है। दिल्ली वृक्ष प्रत्यारोपण नीति दस्तावेज के मुताबिक, तकनीकी एजेंसी को अंतिम भुगतान पेड़ के बचे रहने की दर से जोड़ कर दिया जाएगा। इसमें मानक दर से नीचे पेड़ की बचे रहने की दर के लिए दंड का प्रावधान शामिल है। यदि 50 प्रतिशत से भी कम पेड़ बचे नहीं रहते हैं तो किसी तरह का भुगतान नहीं किया जाएगा और प्रत्यारोपण नीति को विफल घोषित कर दिया जाएगा। अप्रैल में, सरकार ने राष्ट्रीय राजधानी में सभी प्रत्यारोपित पेड़ों की सफलता और बचे रहने की दर का आकलन करने के लिए एक तीसरे-पक्ष से ऑडिट करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। इसके लिए देहरादून स्थित वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई) को शामिल किया गया।