नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने मिथिला के मखाना को जियोग्राफिकल इंडिकेशन टैग दे दिया है। इससे मखाना उत्पादकों को अब उनके उत्पाद का और भी बेहतर दाम मिलेगा। मिथिला के मखाने अपने स्वाद, पोषक तत्व और प्राकृृतिक रूप से उगाए जाने के लिए मशहूर हैं। भारत के 90 फीसदी मखानों का उत्पादन यहीं होता है। इससे पहले बिहार की मधुबनी पेंटिंग, कतरनी चावल, मगही पान, सिलाव का खाजा, मुजफ्फरपुर की शाही लीची और भागलपुर के जरदालू आम को जीआई टैग दिया जा चुका है। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने इसकी जानकारी देते हुए कहा कि जीआई टैग से पंजीकृृत हुआ मिथिला का मखाना, किसानों को मिलेगा लाभ और आसान होगा कमाना। त्योहारी सीजन में मिथिला मखाना को जीआई टैग मिलने से बिहार के बाहर भी लोग श्रद्धा भाव से इस शुभ सामग्री का उपयोग कर पाएंगे। आमतौर पर उपवास में इस्तेमाल होने वाले मखाने स्वास्थ्यप्रद भोजन का हिस्सा रहे हैं। यह ऐसी फसल है जिसे पानी में उगाया जाता है। मखाने में करीब 9.7 ग्राम प्रोटीन और 14.5 ग्राम फाइबर होता है। यह कैल्शियम का बहुत अच्छा स्रोत है। संसद ने उत्पाद के रजिस्ट्रीकरण और संरक्षण को लेकर दिसंबर 1999 में अधिनियम पारित किया था। जिसे जियोग्राफिकल इंडिकेशन ऑफ गुड्स एक्ट 1999 कहा गया। इसे 2003 में लागू किया गया। इसके तहत भारत में पाए जाने वाले प्रॉडक्ट के लिए जीआई टैग देने का सिलसिला शुरू हुआ। वल्र्ड इंटलैक्चुअल प्रॉपर्टी ऑर्गेनाइजेशन के मुताबिक जियोग्राफिकल इंडिकेशंस टैग एक प्रकार का लेबल होता है जिसमें किसी प्रॉडक्ट को विशेष भौगोलिक पहचान दी जाती है। ऐसा प्रॉडक्ट जिसकी विशेषता या फिर प्रतिष्ठा मुख्य रूप से प्राकृृतिक और मानवीय कारकों पर निर्भर करती है। संसद में साल1999 में रजिस्ट्रेशन एंड प्रोटेक्शन एक्ट के तहत ‘जियोग्राफिकल इंडिकेशंस ऑफ गुड्स’ लागू किया था। इस आधार पर भारत के किसी भी क्षेत्र में पाए जाने वाली विशिष्ट वस्तु का कानूनी अधिकार उस राज्य को दे दिया जाता है। ये टैग किसी खास भौगोलिक परिस्थिति में पाई जाने वाली या फिर तैयार की जाने वाली वस्तुओं के दूसरे स्थानों पर गैर-कानूनी प्रयोग को रोकना है।
मिथिला के मखाना को मिला जियोग्राफिकल इंडिकेशन टैग