वेद जो देववाणी कहे गए हैं वहीं से हिंदू दर्शन के स्रोत मिलते हैं तो यह हिंदू दर्शन के जनक माने गए हैं। वेद सनातन है। विश्व में हिंदू धर्म ही सनातन है। यह इसी से सिद्ध होता है हिंदू दर्शन में कहा गया है  ‘वासुदेव कुटुंबकम’ केवल भारत या कुछ देशों को कुटुंब नहीं माना सारा विश्व हमारा कुटुंब है। हिंदू दर्शन में कहीं किसी भूमि जाति का कोई भेद नहीं है। सारे विश्व के लिए समरसता है। सभी का कल्याण हिंदू दर्शन के अंतर्गत है। विवेकानंद जी शिकागो में धर्म सभा को संबोधित करते समय कहते है मेरे अमरीका के भाइयों और बहनों उनके इस संबोधन से ही सारा हॉल तालियों की गडग़ड़ाहट से गूंज उठता है। यह है हिंदू दर्शन जो सारी पृथ्वी को ही कुटुंब मानता है। किसी भी कथा या धार्मिक अनुष्ठान के अंत में जयकारा लगाया जाता है।

‘धर्म की जय हो

अधर्म का नाश हो

प्राणियों में सद्भवना हो

विश्व का कल्याण हो’

किसी एक धर्म की जय नहीं है जो धर्म है। उस की जय जो अधर्म है उसका नाश है। प्राणी मात्र में सद्भावना हो यह नहीं किसी जाति विशेष के लिए कहा गया पूरे विश्व के कल्याण की बात कही गई है। किसी धर्म या जाति विशेष की प्रतिष्ठा नहीं की गई। सभी लोगों के कल्याण की बात कही गई है। यह हिंदू दर्शन है जो सभी का कल्याण और उन्नति चाहता है। और आगे भी कई ऐसे तथ्य है जिससे साबित होता है हिंदू दर्शन विश्व का कल्याण कारक है।

‘सर्वे भवन्तु सुखिन: 

सर्वे सन्तु निरामया

सर्वे भद्राणी पश्यन्तु

मा फलेसु दुख: भाग भवेत’

हमारे  हिंदू दर्शन में सभी के कल्याण की बात हर जगह दिखती है। हमारे मनीषी अपने शास्त्र में सभी के सुख की ही कामना करते हैं। यह उपरोक्त श्लोक से भी सिद्ध होता है। सभी सुखी रहें, सभी रोग मुक्त हो, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बने। अब  हमारे माननीय प्रधानमंत्री ने तो वर्तमान में इस श्लोक को चरितार्थ कर दिखाया है। कोरोना वैक्सिन के डिब्बे पर लिखवाया है ‘सर्वे सन्तु निरामया’ और जिस देश से भी वैक्सिन की डिमांड आई। सभी सहर्ष उपलब्ध कराई है। इससे साबित होता है आज भी भारतीय दर्शन विश्व कल्याण चाहता है।