मानगढ़ (राजस्थान) : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को कहा कि आदिवासी समाज के संघर्ष और बलिदान को आजादी के बाद लिखे गए इतिहास में जो जगह मिलनी चाहिए थी वह नहीं मिली और आज देश दशकों की उस भूल को सुधार रहा है। उन्होंने कहा कि भारत का अतीत, भारत का इतिहास, भारत का वर्तमान, और भारत का भविष्य आदिवासी समाज के बिना पूरा नहीं होता। प्रधानमंत्री ने कहा कि 17 नवंबर 1913 को मानगढ़ में जो नरसंहार हुआ वह अंग्रेजी हुकूमत की क्रूरता की पराकाष्ठा थी। एक ओर आजादी में निष्ठा रखने वाले भोले-भाले आदिवासी थे तो दूसरी ओर दुनिया को गुलाम बनाने की सोच थी, मानगढ़ की इस पहाड़ी पर अंग्रेजी हुकूमत ने डेढ़ हजार से ज्यादा युवाओं, बुजुर्गों, महिलाओं को घेरकर उन्हें मौत के घाट उतार दिया। उन्होंने कहा कि 1,500 से ज्यादा लोगों की जघन्य हत्या करने का पाप किया गया, लेकिन दुर्भाग्य से आदिवासी समाज के संघर्ष और बलिदान को आजादी के बाद लिखे गए इतिहास में जो जगह मिलनी चाहिए थी वह नहीं मिली। प्रधानमंत्री से पहले गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेन्द्र पटेल ने कहा कि जलियांवाला बाग हत्याकांड से भी भीषण इस मानगढ़ हत्याकांड में हजारों आदिवासी राष्ट्रप्रेमी लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी। वहीं, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि आजादी के बाद आजादी की लड़ाई का सही इतिहास सचमुच में नहीं पढ़ाया गया और कई शहीद ऐसे थे जिनका बलिदान सामने नहीं आया। वे राजस्थान के बांसवाड़ा जिले के मानगढ़ धाम में केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय द्वारा आयोजित समारोह मानगढ़ धाम की गौरव गाथा में बोल रहे थे जहां मानगढ़ नरसंहार के शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई। मानगढ़ धाम राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश में रहने वाले आदिवासियों का पवित्र स्थान है। गुजरात में आगामी विधानसभा चुनाव और अगले साल के अंत में राजस्थान और मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए आदिवासी क्षेत्र भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री मोदी पर अकसर हमला बोलते रहे राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कार्यक्रम में मोदी और गुजरात तथा मध्य प्रदेश के अपने समकक्षों-भूपेंद्र पटेल और शिवराज सिंह चौहान के साथ मंच साझा किया। चौहान ने कहा कि हमारे देश को आजादी अंग्रेजों ने चांदी की तश्तरी में रखकर भेंट नहीं की, हजारों क्रांतिकारी हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर चढ़े थे। कई ने अपनी जिंदगी अंडमान और निकोबार की जेलों में गुजार दी थी और कई ऐसे थे जिन्होंने अपने खून की बूंद से मानगढ़ और भारत की भूमि को पवित्र किया था.. रंगा था तब जाकर यह देश स्वतंत्र हुआ था। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद आजादी की लड़ाई का सही इतिहास सचमुच में नहीं पढ़ाया गया और कई शहीद ऐसे थे जिनका बलिदान सामने नहीं आया। पटेल ने कहा कि 17 नवंबर 1913 का वो काला दिन कौन भूल सकता है जब अंग्रेजों ने लगभग 1,500 आदिवासी भाई-बहनों को गोलियों से भून दिया था। उन्होंने कहा कि जलियांवाला बाग हत्याकांड से भीषण मानगढ़ हत्याकांड में हजारों आदिवासी राष्ट्रप्रेमी लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी। हालांकि, कांग्रेस नेता गहलोत ने इतिहास का बचाव करते हुए कहा कि मानगढ़ में बनाया गया इतिहास सुनहरे शब्दों में अंकित है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन में आदिवासी समुदाय का इतिहास महान है। उन्होंने मेवाड़ के राजपूत शासक महाराणा प्रताप की वीरता और साहस को भी याद किया। गहलोत ने स्वतंत्रता संग्राम में जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल और अन्य नेताओं के योगदान को भी याद किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि 1857 से भी पहले 1780 में संथाल में तिलका मांझी के नेतृत्व में ‘दामिन सत्याग्रह’ लड़ा गया था, ‘दामिन संग्राम’ लड़ा गया था। उन्होंने कहा कि 1830-32 में बुधू भगत के नेतृत्व में देश ‘लरका आंदोलन’ का गवाह बना। मोदी ने कहा कि 1855 में आजादी की यही ज्वाला ‘सिधु कान्हू क्रांति’ के रूप में जल उठी और इसी तरह, भगवान बिरसा मुंडा ने लाखों आदिवासियों में क्रांति की ज्वाला प्रज्ज्वलित की। वो बहुत कम आयु में चले गए। लेकिन उनकी ऊर्जा, उनकी देशभक्ति और उनका हौसला ‘ताना भगत आंदोलन’ जैसी क्रांतियों का आधार बना। प्रधानमंत्री ने कहा कि गुलामी की शुरुआती सदियों से लेकर 20वीं सदी तक ऐसा कोई भी कालखंड नहीं दिखेगा जब आदिवासी समाज ने स्वाधीनता संग्राम की मशाल को थामे न रखा हो। मोदी ने कहा कि सोमवार शाम ही मुझे, अहमदाबाद से उदयपुर ब्रॉडगेज लाइन पर चलने वाली ट्रेन को हरी झंडी दिखाने का अवसर मिला है। 300 किलोमीटर लंबी इस रेल लाइन का ब्रॉड गेज में बदलना राजस्थान के हमारे भाइयों और बहनों के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है।’’ उन्होंने कहा कि इस परिवर्तन से राजस्थान के अनेक आदिवासी क्षेत्र, गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों से जुड़ जाएंगे तथा इस नयी रेल लाइन से राजस्थान के पर्यटन को भी बड़ा लाभ होगा।
आदिवासी समाज के बलिदान को इतिहास में नहीं मिली उचित जगह