ताइवान की राष्ट्रपति की अमरीका विजिट से नाराज चीन ने युद्ध अभ्यास शुरू कर दिया है। चीन ने दूसरे दिन की मिलिट्री ड्रिल के दौरान ताइवान को 71 फाइटर जेट्स और 45 वॉर प्लेन से घेर लिया। इस पूरे ऑपरेशन को जॉइंट स्वॉर्ड नाम दिया गया है। ये सोमवार तक जारी रहेगा। ताइवान के रक्षा मंत्रालय ने बताया कि चीनी एयरफोर्स के कई विमानों ने सुबह से उनके देश के आस-पास से कई उड़ाने भरी हैं। वो बीजिंग की मिसाइल फोर्सेस पर भी नजर बनाए हुए है। वहीं, अमरीका ने चीन के युद्ध अभ्यास के बीच उसे शांत रहने की सलाह दी है। चीन के सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक युद्धाभ्यास के पहले दिन चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी ने समुद्र, हवा और सूचना को कंट्रोल में रखने की प्रैक्टिस की थी। वहीं दूसरे दिन जमीनी हमलों का अभ्यास किया गया। ये पहली बार था जब चीन ने आधिकारिक तौर पर ताइवान पर हमले की जगहों को सार्वजनिक किया।
चीन अकेडमी ऑफ मिलिट्री साइंस के रिसर्च फेलो ने ग्लोबल टाइम्स को बताया कि जंग के दौरान इन टारगेट्स पर अटैक करना काफी अहम होगा। इनमें ताइवान के अहम एयरफील्ड, मिलिट्री सिस्टम्स की जगह शामिल हैं। चीन के इस तरह से ताइवान के पास युद्धाभ्यास करने पर अमरीका के स्टेट डिपार्टमेंट के प्रवक्ता ने कहा कि वो चीन की हरकतों पर नजर बनाए हुए हैं। अमरीका के पास इलाके में शांति बनाए रखने के लिए उचित संसाधन हैं। हम अपने नेशनल सिक्योरिटी के वादों को पूरा करने में सक्षम हैं। दरअसल, ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग वेन ने 5 अप्रैल को कैलिफोर्निया में स्पीकर मैकार्थी से मुलाकात की थी। जिसे चीन ने भड़काऊ हरकत बताया था। युद्धपोत और लड़ाकू विमानों से ताइवान की रेकी करने के अलावा चीन ने अमरीका में ताइवान के प्रतिनिधि पर पाबंदियां लगा दी। प्रतिनिधि हसिआओ बी किम और उनका परिवार पाबंदियों के चलते अब कभी चीन, हांगकांग और मैकाउ नहीं जा पाएगा।
इसके अलावा राजदूत की कंपनियां भी चीन के साथ कोई व्यापार नहीं कर पाएंगी। वहीं, चीन ने दो अमरीकी संस्थाओं पर भी बैन लगाने की घोषणा की। रिपोर्ट्स के मुताबिक इन्हीं दो संस्थाओं ने राष्ट्रपति साई इंग वेन की अमरीकी यात्रा की प्लानिंग की थी। इन संस्थाओं में कैलिफोर्निया की रोनाल्ड रीगन लाइब्रेरी भी शामिल है। अमरीका ने 1979 में चीन के साथ रिश्ते बहाल किए और ताइवान के साथ अपने डिप्लोमैटिक रिश्ते तोड़ लिए। हालांकि चीन के ऐतराज के बावजूद अमरीका ताइवान को हथियारों की सप्लाई करता रहा। अमरीका भी दशकों से वन चाइना पॉलिसी का समर्थन करता है, लेकिन ताइवान के मुद्दे पर अस्पष्ट नीति अपनाता है। राष्ट्रपति जो बाइडेन फिलहाल इस पॉलिसी से बाहर जाते दिख रहे हैं। उन्होंने कई मौकों पर कहा है कि अगर ताइवान पर चीन हमला करता है तो अमरीका उसके बचाव में उतरेगा। बाइडेन ने हथियारों की बिक्री जारी रखते हुए अमरीकी अधिकारियों का ताइवान से मेल-जोल बढ़ा दिया।
इसका असर ये हुआ कि चीन ने ताइवान के हवाई और जलीय क्षेत्र में अपनी घुसपैठ आक्रामक कर दी है। हृङ्घभ् में अमरीकी विश्लेषकों के आधार पर छपी रिपोर्ट के मुताबिक चीन की सैन्य क्षमता इस हद तक बढ़ गई है कि ताइवान की रक्षा में अमरीकी जीत की अब कोई गारंटी नहीं है। चीन के पास अब दुनिया की सबसे बड़ी नौसेना है और अमरीका वहां सीमित जहाज ही भेज सकता है। अगर चीन ने ताइवान पर कब्जा कर लिया तो पश्चिमी प्रशांत महासागर में अपना दबदबा दिखाने लगेगा। इससे गुआम और हवाई द्वीपों पर मौजूद अमरीका के मिलिट्री बेस को भी खतरा हो सकता है।