गुवाहाटी : जेएनयू में शंकरदेव पीठ की स्थापना के लिए असम सरकार और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू), नई दिल्ली के बीच नेडफी कन्वेंशन सेंटर, एनईडीएफआई हाउस, जीएस रोड दिसपुर, गुवाहाटी में वृहस्पतिवार की शाम 6 बजे आयोजित एक समारोह में मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत विश्व शर्मा की उपस्थिति में समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया गया। गौरतलब है कि इस सहयोग के जरिए राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संदर्भों में महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव के भक्ति आंदोलन पर शोध, महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव की प्रासंगिकता का अध्ययन और समकालीन भारतीय समाज में उनका भक्ति आंदोलन, श्रीश्री माधवदेव, श्रीश्री दामोदरदेव, श्रीश्री हरिदेव, श्रीश्री अनिरुद्धदेव, आई पद्मप्रिया, आइ कनकलता आदि के जीवन और कार्यों का अध्ययन, असम और भारतीय भक्ति आंदोलन, इसका इतिहास, संगठनात्मक रूप, साहित्य और संस्कृति के विभिन्न पहलुओं के साथ मानद डिग्रियों एवं ब्रजावली भाषा में शोध आदि की व्यवस्था की जाएगी।

समारोह को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री डॉ. शर्मा ने कहा कि राज्य सरकार महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव के आदर्शों और दर्शन के प्रचार-प्रसार को प्राथमिकता दे रही है। इसके हिस्से के रूप में आज जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के संस्कृत और प्राच्यविद्या अध्ययन संस्थान में श्रीमंत शंकरदेव आसन की स्थापना के लिए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए। उन्होंने कहा कि इसके लिए राज्य सरकार 10 करोड़ रुपए देगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि जरूरत पडऩे पर राज्य सरकार अधिक धनराशि उपलब्ध कराएगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि आसन की स्थापना असम और भारत के बाहर महापुरुष के भक्ति आंदोलन के दर्शन के अध्ययन और अनुसंधान के लिए की गई है। यह महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव के भक्ति आंदोलन और असम के बाहर उनके जीवन दर्शन पर अध्ययन और शोध को प्रोत्साहित करेगा। यह आसन समकालीन भारत में भक्ति आंदोलन और इस भक्ति आंदोलन में महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव की भूमिका के बारे में भी जानकारी प्रदान करेगी। इस आसन की स्थापना से श्रीमंत शंकरदेव, माधवदेव और भक्ति आन्दोलन का नेतृत्व करने वाले अन्य महापुरुषों के साथ सत्र, नामघर और अन्य वैष्णव संस्थानों की महत्वपूर्ण भूमिका का अध्ययन भी शामिल होगा।

मुख्यमंत्री ने कहा कि महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव के नाम पर राज्य के बाहर यह तीसरा आसन है। इससे पहले पश्चिम बंगाल में शांति निकेतन में विश्वभारती विश्वविद्यालय और पंजाब विश्वविद्यालय में महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव के नाम पर आसन की स्थापना की गई थीं। मुख्यमंत्री ने कहा कि महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव ने अपनी रचनाओं और कार्यशैली से भारतीय सभ्यता और संस्कृति को चित्रित किया। उन्होंने कहा कि महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव के लेखन में 46 बार भारत का उल्लेख किया गया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि महापुरुष के कार्य भारत की चेतना को दर्शाते हैं और श्रीमंत शंकरदेव की दृष्टि अखिल भारतीय संदर्भ में हुई। महापुरुष ने सांस्कृतिक भारत का आदर्श दिखाया है। भारतीय चेतना के इस दर्शन को 15वीं सदी में बहुत महत्वपूर्ण बताते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि महापुरुष के कार्यों और दर्शन की अन्य विश्वविद्यालयों या संस्थानों में उतनी चर्चा नहीं हुई, जितनी होनी चाहिए थी। मुख्यमंत्री ने कहा कि भक्तिवाद आध्यात्मिक और बौद्धिक रूप से सहज रूप से जागृत गहन प्रेम और ईश्वर के प्रति समर्पण पर आधारित सिद्धांत है। भक्ति आंदोलन वह आंदोलन है जो भक्तिवाद की स्थापना के लिए बनाया गया था। उन्होंने कहा कि कई सुधारवादी महापुरुषों के नेतृत्व में भक्ति आंदोलन ने छठी से नौवीं शताब्दी ईस्वी तक पूरे भारत में एक क्रांतिकारी हलचल शुरू की।

मुख्यमंत्री ने कहा कि इन महान गुरुओं ने साम्यवादी और मानवीय मूल्यों के साथ एक लोकतांत्रिक समाज का परिचय देने के लिए अथक प्रयास किया। इन मानवतावादियों ने मानव जीवन के एक नए मूल्यांकन के लिए एक विष्णु या एक ईश्वर के इर्द-गिर्द भक्ति आंदोलन का नेतृत्व किया। धार्मिक आंदोलन ऋषि शंकराचार्य द्वारा शुरू किया गया था, जिन्होंने अद्वैत बह्म की पूजा और सच्चे ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति की बात की थी। मुख्यमंत्री ने कहा कि शंकराचार्य के इस मध्यकालीन भक्ति आंदोलन को दक्षिण भारत में रामानुजाचार्य और उत्तर भारत में रामानंद ने पुनर्जीवित किया। समारोह में शिक्षा मंत्री डॉ. रनोज पेगु, प्रो. ननीगोपाल महंत, सलाहकार, शिक्षा विभाग, असम सरकार, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर शांतिश्री धूलिपुरी पंडित, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के रेक्टर प्रोफेसर सतीश चंद्र गरकाती, शिक्षा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव बीएस श्यामलाल व अन्य गणमान्य लोग मौजूद रहे।