नई दिल्ली : उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को हिंसा- प्रभावित मणिपुर के नागरिकों तथा सार्वजनिक एवं निजी संपत्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का केंद्र एवं राज्य सरकार को निर्देश दिया तथा यह स्पष्ट कर दिया कि कानून-व्यवस्था कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में है और शीर्ष अदालत यह निर्णय नहीं ले सकती कि कहां-कहां सेना और केंद्रीय बल तैनात किए जाने हैं। हिंसा प्रभावित मणिपुर में नागरिकों को हो रही दिक्कतों को कम करने को लेकर विभिन्न पक्षों का प्रतिनिधित्व कर रहे वकीलों के सुझावों पर विचार-विमर्श करते हुए शीर्ष अदालत ने सभी को यह कहते हुए आगाह किया कि हम सभी पक्षों से अपने बयानों में संतुलन बनाए रखने का अनुरोध करते हैं और इसके लिए किसी भी पक्ष से नफरती बयान नहीं आना चाहिए।
अल्पसंख्यक कुकी समुदाय वाले इलाकों में सेना और केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती सहित विभिन्न सुझावों पर कड़ी आपत्ति जताते हुए प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि शीर्ष अदालत ने देश के 70 साल से अधिक के इतिहास में ऐसा कभी नहीं किया है, क्योंकि सेना कार्यपालिका के असैनिक नियंत्रण में होती है। पीठ ने कहा कि सुझाव का यह रूप नहीं होना चाहिए था। उदाहरण के तौर पर आप अदालत को भारतीय सेना एवं अर्द्धसैनिक बलों को यह निर्देश देने को कह रहे हैं कि वे किस तरह की कार्रवाई करें। स्पष्ट बोल रहा हूं, देश के इतिहास में पिछले 70 साल में उच्चतम न्यायालय ने भारतीय सेना को इस तरह का कोई निर्देश जारी नहीं किया है। पीठ में न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी शामिल थे।
न्यायालय ने कहा कि हमारे लोकतंत्र की एक बड़ी खुबसूरती सशस्त्र बलों पर असैनिक नियंत्रण है। इसे न समाप्त करें। हम ऐसा नहीं करेंगे। हम भारतीय सेना को कोई निर्देश जारी करने नहीं जा रहे हैं। पीठ ने कहा कि हालांकि हम राज्य सरकार और केंद्र को मणिपुर के लोगों के जानमाल और स्वतंत्रता की रक्षा सुनिश्चित करने को कहते हैं। किस जगह कौन सी खास बटालियन तैनात होगी, हमारे लिए इसका निर्धारण करना बहुत ही खतरनाक है। शीर्ष अदालत ने इन आरोपों को ‘भयानक’ बताया कि कथित तौर पर अल्पसंख्यक जनजातियों पर हमला कर रहे कुछ उग्रवादी समूह को सरकारों (केंद्र और राज्य में) का समर्थन प्राप्त है।